اجبرتني….

احمدعمر اللحوري.

المكلاحضرموت

اجبرتني….

بجمالها….

ولكن….

خدعتني….

بكلامها…..

تخليت….

عن من حولي….

وانتظرت….

طيفها…..

سامت….

من وعودها….

وكاني….

غدرت….

من حبها…..

بعد ان عاتبتني….

بنظراتها…….

غادرت….

عنها….

وركبت….

بحور…..

عشقها….

راجتني…..

بعنوة….

واكسر….

خاطري….

لسد ابوابها…..

ترنلت قليل…

عسى يبان….

ماجعلها…..

تنساء….

ميعادي….

معاها….

غظب….

قلبي…

لاالومه….

موجوع…

منها….

ومااصبه….

بجرح….

مندمل….

اطفي….

عليه….

يازمن…

جنوخ….

امواج….

فكري…

تلعب….

لعيب….

مادري….

بان كل….

صابر….

يهاديه…

الطوفان….

يملكه….

بهديان….

راقني….

الشوق….

فاابتعدت…

عن مافي قلبي…

وسافرت…

بفكري…..

بعيد….

ارتفت…

الى الجبال…

رايت الشوق….

زاد والحب…

نارواشتياق….

ولكني….

وضعت…

عيني….

الاتنام….

لم انساء….

هاجسي….

للحباب…

لكني….

من هذا….

الانساب….

سبت….

الناس…

لااعتز…

بعيد…

في دار….

مهجور….

في ارتفاع….

تراءالسحاب….

والضباب….

يرافقك….

عند اختفاء….

الشمس….

وتبداء….

الامطار….

تبتسم…

الورد….

والاعشاب….

وقلبي….

يحترق…

من الحبيب….

والهجران….

سااغادر….

ولااريد….

احراج….

وابني….

بيت….

وحدايق….

وازهار…..

ولااكون….

ماجور….

لمن لايريد…

الحب والاحسان….

سااعيش….

واصبر….

وفي الصبر….

احسان….

وارتقاء….

لعظمة….

الانسان….

ايها الرحيل….

ياسيد….

الاحكام…..

بحثت….

كثير….

لاراء….

نعمة….

اسندها….

متنفس….

الانعاش….

بااحكام….

فاغدا….

لنا لقاء….

ياريته…

لم يكون…

سااعيش….

افضل….

ع الاحلام….

دون اكسر….

خاطر….

لمن لايقدر….

عشقي….

ولاحبي…

آسف ايها….

الزمان….

كرامتي….

سيدة….

الامان….

بين المزارع…..

ولاشوارع….

او قهر….

من دون احترام…

احترم….

مكانتي…

ولاعين….

تنظر اليه….

بخداع…..

اسف ياحبيب…

قف لحدودك

موته بعزه….

ولانظره بااحتقار…..

اسف سيدتي انتي….

جارحه….

تقتلين روحي….

عاشقه بدون كلام…..

لم يكون الجسد….

بعيد….

ساياكله النار….

بااحتراق….

لايستطيع…..

ان يخمد….

البركان….

من صدره….

الاسااغنيه….

بالاحسان….

والحب….

ورقة الكلام…..

والفل والريحان….

ساابني مزارعي….

في صدري…..

ولاقلوب الحرمان….

خيب امالي حبيبي….

نسي الميعاد…..

احمدعمر اللحوري.

المكلاحضرموت

قد تكون صورة ‏‏شخص واحد‏ و‏ضباب‏‏

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