احمدعمر اللحوري.
المكلا حضرموت
رجوت منك….
ان تسمعني….
ولاتنهر….
قلبي….
حين…
منك…..
كلمة….
من عسيدة….
السان….
انت ….
بدرفي الكون….
تلالي….
تنساء….
الذي كان….
بيننا…..
حبيب….
ساعدني….
لامضي….
ع درب….
الحب….
اسني….
ان رجمتني…..
بعيدا…..
سااعوم….
في فلك العشق….
لوحدي…..
ان قلت له…..
احبك….
اخاف منه….
يقاطعني….
وانا اعشقه….
تلك العيون….
اتخيلها…..
هناء….
وانا اجلس…
امام امواج….
البحر….
تغرق قدميه…
في مكاسرها….
ريت من مثلي….
ينثرو….
من صدره….
الاهات….
ودموعه….
تختلط….
بامواج البحر…
اتاها قلمي…
وحبي وعشقي…
رفضتهما…..
ماذا تريدو…
ياهذا….
اني تورعت…
لذاتي ونفسي….
لاعذب قلبك….
واجرحه….
لانه يعشقني….
فانجوم الليل….
اقرب له مني….
لاني لااحبك….
قد ابليت تشهيري….
فان عشقك…
ليه مذلة….
وبحرك لايناسبني….
لكني احب قربك….
واتلاعب بعواطف….
لاتلذذ بموتك…..
في قلبي….
واقبره في صدري….
حيرتني….
كلماتها….
ولاادري…
ماذا….
تريد….
غظب…
الشوق….
لها….
وهي تريدني….
قتيل…..
من يشفق….
ع قتيله….
ان كان له….
في العشق ….
نصيب…..
ارفعت….
راسي….
للسماء….
ان كان….
النجم….
سياتي….
من بعيد….
بكت السماءعليه….
وقلت دعه….
يكون بعيد….
قد يفقد جماله….
لانك انت….
الاصيل….
لاتواري….
من يحكي….
فاقلبه…..
لاينطق….
مثل اللسان….
بادرتك….
بقولها…..
انت عندك….
شديد……
يشهد الله….
لانعلم….
بمايصده…
قلبها….
فاصدرها….
كله اسرار….
ان وضعت….
راسك عليه….
سمعت….
صوت….
شفيق….
وزفير…..
لامتني…
بعشقي…
وحبي….
فااتا ليس….
لها وحيد….
قدتمراء….
قلبي….
بجرح….
لسيدتي….
في عقلي….
يسيد….
هاجرني….
الطائر….
من هجرها….
وردفني….
بلوم عميق…..
قلت له….
هذا قدري….
وهذا حبيبي….
ماله بديل…..
ان خانني….
خان نفسه….
وان عابني….
ضيع وزن….
في الميزان…..
ان بعده…..
ومطول….
فيه وحاب….
وهو يدري….
بحبي ملكه….
مدى السنين…..
شاء القدر…..
نلتقي….
واشاهد…..
في عينه….
حب حزين….
ورودها تدبل….
وتسقط….
مادموعها….
في الارض تسيل…..
كم روتها وريدي…..
كانت بالامس……
ضانيه….
تبحث عن حبيب….
آه من دمعتها….
حين تسيل…..
تسال عن قلب جريح…..
احمدعمر اللحوري.
المكلا حضرموت
